सोमवार, २० जुलाई २००९

एक सफर मंज़िल का

कल रात एक फिल्म देखी "दि डेड पोएट्स सोसायटी" , यह बोर्डिंग में पढ़ रहे कुछ किशोरों और उन्हें कविता पढ़ाने वाले अध्यापक (रोबिन विलियम्स) के बीच के भावनात्मक संबंधों की कहानी है। जी नहीं, यह पोस्ट इस फिल्म के बारे में नहीं है। दरअसल यह फिल्म देख कर मुझे एक और अध्यापक याद आया जो इस फिल्म के अध्यापक की तरह ही न केवल बच्चों का चहेता है बल्कि उनकी प्रेरणा का स्रोत भी है। उनके बारे में मैं बहुत दिनों से लिखना चाह रही थी लेकिन न जाने किन वजहों से लगातार टलता जा रहा था। बहरहाल इस फिल्म ने एक तरह से उकसाने का काम किया इसलिए आज की पोस्ट रवि यानि रवि गुलाटी के नाम।

रवि गुलाटी दिल्ली में कम आयवर्ग के बच्चों के लिए अपने घर में ही मंज़िल नाम से एक स्कूल चलाते हैं। घर का मतलब अगर आश्रय से होता है तो रवि का घर अपने अर्थ को पूरी संपूर्णता के साथ सार्थक करता है। उनकी बहन सोनिया का गर्मजोशी भरा स्वागत, निश्चल हंसी और निरंतर चलने वाली बातें पहली बार आने वालों को भी पुराने दोस्तों का सा सहज बना देती है। फिर आप मिलते हैं ममत्व को नए अर्थों में परिभाषित करती रवि की मां श्रीमति इंदिरा गुलाटी से, जिन्होंने अपनी जिंदगी के पिछले 35-40 साल खास जरूरतों वाले बच्चों को इस कठिन दुनिया में जीने के सबक देने में बिताए हैं। वह अब भी पूरी सक्रियता के साथ जुटी रहती हैं मंज़िल के कोटला मुबारकपुर वाले केंद्र से संचालित होने वाले अपने सेवा कार्यों में।

रवि के बारे में सबसे ज्यादा प्रभावशाली चीज़ है सादगी जो उनके बेपरवाह पहनावे से ले कर समाज व दुनिया के बारे में संजीदा सोच सब में बहुत साफ नज़र आती है। कहीं शब्दों का आडंबर नहीं, कहीं अपने विचारों को सही ठहराने की आक्रमकता नहीं, कोई लाग-लपेट नहीं बस सीधी सच्ची व्यवहारिक बात। वह अमेरिकी साम्राज्यवाद की आलोचना करते हैं बिना उत्तेजित हुए शांति से अपने तर्क देते हुए। कभी गांधी की किसी बात की सार्थकता साबित करेंगे बहुत साधारण लेकिन अकाट्य उदाहरण के साथ। दूसरे की बात को पूरा महत्व देते हुए सुनना उनकी एक और विशेषता है। दोस्तों की मंडली में गिटार के सुरों पर अंग्रेजी गाने गाते-गाते वह उसी तन्मयता के साथ मालवा शैली में कबीर भी गाने लगते हैं।


रवि गुलाटी दिल्ली के धनपतियों के इलाके खान मार्केट में रहते हैं लेकिन उनकी बाबस्तगी पङोस के आलीशान घरों की बजाय उनके सर्वेंट क्वार्टस में रहने वाले नौकरों, धोबियों, साइकिल की दुकान पर काम करने वाले कारीगरों जैसे कम आयवर्ग के लोगों से रही है। सीमित आय में जैसे-तैसे गुज़ारा करके भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला कर बेहतर भविष्य का सपना देखते इन लोगों के सपनों को सच बनाने के लिए रवि ने अपने घर के दरवाजे उन बच्चों के लिए खोल दिए और उसे नाम दिया मंज़िल। हालांकि रवि ने आईआईएम, अहमदाबाद से गुर तो कॉरपोरेट प्रबंधन के सीखे लेकिन मंज़िल में उनकी भूमिका अध्यापक की रही। बच्चों को पढ़ाते हुए उन्हें अहसास हुआ कि हमारे स्कूलों में पढ़ाने के तरीके कितने गलत हैं, वो सिर्फ रटना सिखाते हैं, जानना नहीं। उन्होंने बच्चों को दिलचस्प और सरल तरीके से गणित और अंग्रेजी सिखानी शुरू की।

मंज़िल में 1998 से बच्चों के आने का सिलसिला जो शुरू हुआ वो अब तक जारी है। यहां बच्चे गणित, अंग्रेजी और कंप्यूटर खुद पढ़ते भी हैं और दूसरे बच्चों को पढ़ाते भी हैं। यहां सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, गाना- बजाना, थियेटर, कला सब कुछ होता है। यहां के बच्चों का एकम् सत्यम नाम से अपना एक म्यूज़िक बैंड भी है। मंज़िल इन बच्चों के लिए अपना घर है शायद उससे कुछ ज्यादा ही है। यह जगह हमेशा गुलज़ार रहती है उनके शोर से, गीत-संगीत से, बातों से। यह जगह हमेशा युवा उर्जा से भरी रहती है जिसे आप वहां उपस्थित हो कर स्वयं महसूस कर सकते हैं। रवि के इस स्कूल में कोई फीस नहीं ली जाती। हालांकि अनुशासन बनाए रखने के लिए कक्षा में देर से आने पर उन्हें मामूली सा जुर्माना देना पढ़ता है।

अधिकांश किशोरवय के इन बच्चों के साथ रवि का व्यवहार हमउम्र जैसा रहता है जिसके चलते उनमें न केवल आत्मविश्वास बढ़ता है बल्कि उनमें नेतृत्व करने जैसे गुण भी विकसित होते हैं। यहां उनकी कल्पनाशीलता, स्वतंत्र सोच को पूरा सम्मान दिया जाता है। यही वजह है कि अब रवि की गैर-मौज़ूदगी में भी मंज़िल का काम-काज बिना किसी रूकावट के चलता रहता है वो चाहे पढ़ाने का काम हो या थियेटर जैसी कोई गतिविधि। यह किसी भी संस्था के कामकाज का आदर्श तरीका है क्योंकि अक्सर व्यक्तिगत प्रयासों से शुरू हुई कोई मुहिम व्यक्ति केंद्रित ही हो कर रह जाती है।

रवि से जब भी कोई पूछता है तुम लोग क्या सिखाते हो बच्चों को तो उनका जवाब हमेशा यही होता है मंज़िल में आओ, मेरे बच्चों से मिलो। सचमुच मंज़िल के बच्चों से मिल कर पता चलता है कि रवि से उन्हें क्या मिला है मूल्यों के प्रति आस्था, आपसी सहयोग से आगे बढ़ने की प्रवृति और आत्मविश्वास से लबरेज़ इन बच्चों में सबसे अच्छी बात यह लगती है कि ये अपनी गरीब पृष्टभूमि को ले कर बिल्कुल भी शर्मिंदा नहीं हैं। वो जानते हैं उन्हें इस जमीन पर खङे हो कर ही ऊंचाइयां छूनी है और वो कोशिश कर रहे हैं। और एक ईमानदार कोशिश से ज़्यादा चाहिए भी क्या? यही वजह है कि इनमें से बहुत से बच्चे, जो दरअसल अब बङे हो चुके हैं, अपनी-अपनी रुचि के कार्यक्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं। रवि के दोस्तों का दायरा काफी बङा है, समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय ये लोग समय-समय पर मंज़िल के बच्चों का मार्गदर्शन करते रहते हैं।

रवि परस्पर संवाद को महत्वपूर्ण मानते हैं इसलिए ये बच्चे रवि भैया से दुनिया-जहान की बातें करते हैं और उन बातों से सीखते हैं कि गरीबी या अंग्रेजी न आना ऐसी कोई चीज़ नहीं हैं जो आगे बढ़ने से रोक पाएं। अंग्रेजी एक भाषा मात्र है जिसे चाहो तो कोशिश करके सीखा जा सकता है। रवि बहुत गर्व से बताते हैं कि मेरे बच्चे अगर कुछ सीखना चाहते हैं तो उसके जानकार के पास पहुंच जाते हैं, अगर कोई सिखाने से मना करता है तो वो किसी दूसरे के पास पहुंच जाते हैं वहां भी सुनवाई न हुई तो फिर अगले के पास पहुंच जाते हैं बिना दिल छोटा किए। वो जानते हैं अगर वो सीखना चाहते हैं तो ऐसे लोग भी हैं जो सिखाना चाहते हैं, इसलिए वो कोशिश करना नहीं छोङते। ये हार न मानने वाली बात रवि का मूलमंत्र है अपने बच्चों के लिए, तो फिर हारने की गुंजाइश है कहां?

रवि को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानती हूं और उन्हें जानने वाला हर कोई यह जानता है कि वह कितने निस्वार्थ भाव से यह काम करते हैं। बदले में किसी तरह की पहचान या सम्मान जैसी चीज़ों के बारे में सोचे बिना चुपचाप कुछ जिंदगियों को बेहतर बना रहे रवि जैसे लोग इंसान और इंसानियत की ताकत पर भरोसा बनाए रखते हैं। किशोरावस्था जैसी नाज़ुक उम्र में इन युवा उर्जाओं को सही दिशा दिखाने और उनको आगे बढ़ने में मंज़िल की भूमिका के बारे में और जानना चाहें तो www.manzil.in पर एक नज़र डालना न भूलें।

शनिवार, ११ अप्रैल २००९

...इस दुनिया को बस अब बदलना चाहिए

इतिहास और भूगोल कभी भी न तो मेरे पाठ्यक्रम में शामिल थे न मेरे पसंदीदा विषयों की सूची में, लेकिन अब मुझे लगता है कि ये दोनों महत्वपूर्ण विषय अगर मैंने पढे होते तो समाज के बारे में, दुनिया के बारे में मेरी समझ बहुत बेहतर होती। तब शायद अफगानिस्तान मेरे लिए पाकिस्तान की सीमा से लगा एक मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों वाला, अलकायदा को पनाह देने वाले एक मुसलिम देश के अलावा कुछ और भी होता। तब शायद मैं जान पाती कि वहां पारदर्शी पानी से भरी नदियां भी हैं और लहलहाते खेत भी थे। इतिहास मुझे बताता कि कैसे ताकतवर देश अपनी बादशाहत के लिए किसी दूसरे देश को बरबादी की किस हद तक ले जा सकते हैं। कट्ठरवादिता कैसे मासूम बच्चों को तालिबान बना देती है, मुजाहिदीन बना देती है, जिंदा बम बना देती है यह सब मुझे बेहतर तरह से मालूम हो पाता।


तब शायद मुझे यह बात समझनी ज़्यादा आसान लगती कि किसी भी देश में ज़्यादातर आम लोग होते हैं जो गिने-चुने लोगों की सियासतों के बीच जीते हैं। यह भी पता होता कि वहां कट्ठरपंथियों की दहशत तले भी लङकियां प्यार करती हैं, परिवार बनाती हैं। वहां भी लाल-लाल गालों वाले खूबसूरत बच्चे गलियों में वही खेल खेलते हैं जो सारी दुनिया के सारे बच्चे खेलना जानते हैं। शायद तब ये सोचना ज़्यादा स्वाभाविक लगता कि वहां भी बच्चे मां की आंख का तारा होते हैं और जब वो किसी और की लङाई कि ज़िहाद समझ कर लङते हुए जवान होने से पहले ही मर जाते हैं तो उस मां का दुख दुनियां में किसी भी मां के दुख जैसा होता है।


पिछले दिनों अफगानी लेखक खालिद हुसैनी की दूसरी किताब a Thousand splendid suns पढने के बाद मुझे शिद्धत से इस बात का अहसास हुआ कि अखबारी खबरों से किसी समाज को किसी खास छवि में बांध देना कितना गलत है। पेशे से डॉक्टर खालिद हुसैनी अफगानिस्तान में पैदा हुए और अस्सी के दशक में उनका परिवार शरणार्थी के रूप में अमेरिका जा बसा। दो-ढाई साल पहले उनकी पहली किताब the kite runner पढी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी। यह एक मर्मस्पर्शी कहानी है सत्तर के दशक में काबुल में रहने वाला १२ साल का बिन मां का आमिर अपने प्रभावशाली पिता की नजर में खुद को बहादुर साबित करना चाहता है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर होने वाले पतंगबाजी मुकाबले को जीतना उसका लक्ष्य है। आमिर यह मुकाबला जीत जाता है लेकिन उसी दिन उसके खास दोस्त हसन के साथ हुआ हादसा उसे गहरी आत्मग्लानी से भर देता है। अपनी कमतरी को छिपाने के लिए वह हसन पर चोरी का आरोप लगा कर अपने अहाते में बने नौकरों वाले घर से निकलवा देता है। आगे चल कर दोनों की जिंदगियां क्या मोङ लेती हैं, वो है इस उपन्यास की कहानी। हालांकि आमिर और हसन दोनों में से कोई भी नायक नहीं है, इसका मुख्य पात्र है दिनों दिन बद से बदहाल होता अफगानिस्तान। बदलते राजनीतिक हालत किस तरह से आम आदमियों की जिंदगियों की दशा दिशा कैसे बदलते हैं, इसे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी के जरिए कहा गया है the kite runner में।


पिछले दिनों जब मैंने खालिद हुसैनी की A thousand splendid suns पढी तो ज्यादातर हिस्सा डबडबाई आंखों से ही पढा गया। ये बहुत उदास लेकिन बहुत खूबसूरती से लिखी गई किताब है। यहां भी कहानी का मुख्य पात्र अफगानिस्तान ही है। लेकिन यहां औरतों की दुनिया में झांका गया है। इस कहानी में एक मरियम है और एक लैला है। एक अमीर बाप की अवैध संतान है और एक तरक्कीपसंद पिता की लाङली। एक अपने पिता को शर्मिंदगी को छिपाने की मजबूरी में और दूसरी बम विस्फोट में परिवार को खो देने के बाद बने हालातों में एक ही आदमी की बीबी बनती हैं। 15 साल की मरियम से जब राशिद ने शादी की तो उसकी उम्र थी लगभग 45 साल और 27 साल बाद जब उसने दूसरी शादी की तो लैला की उम्र भी 15 ही साल थी। ये अफगानिस्तान की औरतों की बेबसी और उससे मुक्त होने की उनकी कोशिशों की कहानी है।


ये बिल्कुल संयोग ही था कि इस किताब के बाद मैंने जो फिल्म देखने के लिए चुनी वो थी पाकिस्तान के फिल्मकार सोएब मंसूर की 'खुदा के लिए' । संयोग इसलिए कि खालिद हुसैनी की दोनों किताबें और यह फिल्म एक सी नहीं तो काफी मिलती जुलती सी परिस्थितियों की कहानी कहती हैं । फिल्म 'खुदा के लिए' बहुत तर्कसंगत रूप से पाकिस्तान के बारे में आम आदमी की गलतफहमियों को दूर करती है। यह 9/11 के बाद पाकिस्तान के आम तरक्की पसंद मुसलमान की कशमकश को बयान करती एक बढिया फिल्म है । इस फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा वो है जहां ब्रिटेन में रह रहा एक पाकिस्तानी अपने दीन की हिफाज़त के लिए बेटी मरियम को धोखे से पाकिस्तान ले जा कर उसे बिना बताए उसकी शादी कर अफगानिस्तान के एक गांव में छोङ आता है। यह एक रोंगटे खङे कर देने वाला दृश्य है। यह फिल्म इस्लाम के नाम पर फैले बहुत से भ्रमों को बहुत खूबसूरती के साथ दूर करती है।एक खालिद की मरियम है जो कुरान के कुछ अक्षर बांच पाती है और जो दुनिया के बारे में बस उतना ही जानती है जितना बचपन में उसके पिता ने और शादी के बाद उसके पति ने बताया। सोएब मंसूर की मरियम इंग्लैंड में पली बङी आज़ाद खयाल लङकी है। लेकिन विडंबना देखिए कि दोनों के बाप उनकी मर्जी के खिलाफ उनकी जबरन उनकी शादियां करवाते हैं। आखिर क्यों होता है औरतों के साथ ‌ऐसा हर कहीं?

ये दोनों किताबें और यह फिल्म काफी पहले आ चुके हैं लेकिन चूंकि मैंने ये अब पढीं और देखी और मन किया कि लिखूं सो लिख डाला।

शुक्रवार, १३ मार्च २००९

ये रंग होली के नहीं हैं….


आंखे पहले हाथ में पकङाई गई चीज़ पर नज़र डालती हैं और फिर शर्मिली मुस्कराहट के साथ जब वो मुझे दोबारा देखती हैं तो एक खास किस्म की खुशी से चमक रही होती हैं। लगभग हर बच्चे की प्रतिक्रिया एक सी होती है। हर बार बच्चों की आंखों में वो चमक देख कर मैं सोचती हूं कि इस बार तो अतिमा भाभी को फोन करके एक बहुत बङा वाला धन्यवाद देना है जिनकी वजह से किसी को खुश करने के खुशगवार पल मुझे मयस्सर होते हैं। बच्चों को उल्लास से भर देने वाली वो भेंट होती हैं खूब सारे पेंसिल वाले रंग।


पिछले तीन-चार साल से कम से कम दो सौ बच्चों को रंगीन पेंसिलों के तोहफे मेरे हाथों से बंट चुके हैं। ये वो बच्चे हैं जिनके लिए रंगीन पेंसिलें खरीद पाना मुश्किल नहीं तो आसान भी नहीं हैं। आमतौर पर निम्न आयवर्ग परिवार के इन बच्चों के अभिभावकों के लिए उनके लिए बहुत जरूरी चीजें जुटा पाना भी मुश्किल होता है। कापी-किताब और पेंसिल या पेन मिल जाए वही बहुत है। ऐसे में अच्छी क्वालिटी की भले ही थोङी बहुत इस्तेमाल की हुई बीस-पच्चीस पेंसिल वाले रंगों का तोहफा बच्चों के खास ही होता है।


थोङी बहुत इस्तेमाल की हुई ये पेंसिलें मेरे पास पहुंचती हैं अतिमा भाभी के द्वारा सिंगापुर से। भाभी का पूरा नाम अतिमा जोशी है जो अपने पति नीरज जोशी और एक किशोरवय बेटी नीतिमा के साथ सिंगापुर में रहती हैं और एक स्कूल में पढाती हैं। वहां पढाते हुए उन्होंने देखा कि उनकी क्लास में बच्चे स्टेशनरी का बहुत ही लापरवाही के साथ इस्तेमाल करते हैं। पेन, पेंसिल, रंग, पेंसिल शार्पनर जैसी चीजें थोङे से प्रयोग के बाद फेंक दी जाती हैं।


हिंदुस्तान जैसे देश में मध्यमवर्गीय परिवार में पले-बङे संस्कारी मन से ये बरबादी हजम न होनी थी न हुई। सो उन्होंने बेकार समझ कर फेंक दी गई उन रंगीन पेंसिलों को इकट्ठा करना शुरू किया और अपनी सालाना यात्रा में जब हिंदुस्तान आईं तो रंगों की वो पोटली साथ लाना नहीं भूलीं। अच्छी खासी भर चुकी उस पोटली से कुछ रंग उन्होंने खुद बांटे और कुछ मुझे दे दिए। लगभग तीन साल पहले शुरू हुआ यह सिलसिला तब से बरकरार है।


यहां इस पोस्ट का मकसद किसी को महिमामंडित करना नहीं है बल्कि सिर्फ यह बताना भर है कि थोङी सी सकारात्मक सोच और थोङी सी पहल थोङी सी ही सही लेकिन इतने सारे बच्चों के लिए खुशी का सबब बन गई। बच्चों की दुनिया को रंगीन बनाने के लिए यह छोटी सी पहल भी कितनी महत्वपूर्ण है, हाथ में पेंसिल पकङे बच्चे की उछाह भरी मुस्कान मुझे बहुत अच्छी तरह से बता देती है।

मेरे ब्लॉग पर आने वाले सभी परिचित, अपरिचित मित्रों को होली मुबारक। इस होली में रंग न केवल तन को बल्कि मन और सपनों को भी रंगें।

बुधवार, ७ जनवरी २००९

नए साल के बहाने

'इससे पहले कि बात टल जाए.....' रेडियो पर गुलाम अली ने अपनी दिलकश आवाज़ में गज़ल की शुरूआत जैसे मुझे चेताने के लिए ही की थी। अचानक मुझे याद आया कि नए साल में मेरा खुद से यह वादा है कि नियमित रूप से कुछ न कुछ लिखना जारी रखूंगी। लेकिन हालत देखिए, गुलाम अली साहब ने याद न दिलाया होता तो साल का पहला हफ्ता तो बस यूं ही गुजर जाता। सो इससे पहले कि वक्त टल जाए, कुछ बातें हो ही जाएं।

गया साल जाते-जाते उदासी भरी टीस दे गया, कुछ को आर्थिक तौर पर बरबाद कर गया और अधिकांश को आतंकित करके गया। आम आदमी कुछ दिन चीखने-चिल्लाने, इस-उस को दोष लगाने, कुछ को गरियाने के बाद कलपते दिल पर आने वाले साल के बेहतर होने की उम्मीद का फाहा रख कर शांत बैठ गया। दरअसल उम्मीद चीज़ ही ऐसी है। हम गहरे से गहरा दुख बेहतर कल की उम्मीद के साथ झेल जाते हैं, पल-पल सरकता समय भी हमें बीते वक्त के सुख-दुख को बिसरा आने वाले समय को आशा भरी नजरों से देखने के लिए तैयार करता है। शायद यही वजह है कि हर कोई यह जानते हुए भी कि नया साल बीत चुके बहुत सारे दिनों जैसा ही एक आम दिन है, उसे खास अहमियत देता है, उसका स्वागत करता है।

यहां सोनापानी में हम लोग हर साल 30-31 दिसंबर को कुछ खास तरीके से मनाने की कोशिश करते हैं। इन दिनों यहां बेतरह ठंड होती है। हालांकि दिन में चटखदार धूप खिली होती है लेकिन जहां शाम के चार बजे कि हवा बर्फीली होने लगती है, पाला गिरने के कारण ठंड और मारक होती है। लेकिन जब आप अलाव के आस-पास बैठे दिलकश संगीत का मज़ा ले रहे हों तो यह सर्दी लुत्फ भी उतना ही देती है। इस बार 30 दिसंबर को हमने मुंबई के अरण्य थियेटर ग्रुप के नए नाटक ‘द पार्क’ का प्रिमियर यानी पहला शो किया जो खासा पसंद किया गया। यह नाटक मानव कौल ने लिखा है जो इससे पहले ‘शक्कर के पांच दाने’, ‘पीले स्कूटर वाला आदमी’, ‘बल्ली और शंभू’, ‘इलहाम’ और ‘ऐसा कहते हैं’ जैसे कथ्य की दृष्टि से काफी सशक्त नाटक लिख चुके हैं। मुंबई, दिल्ली के नाटक जगत में उनके नाटक खासे चर्चा में रहते हैं।

उनके नए नाटक ‘द पार्क’ की चर्चा यहां न करके उसका अलग से रिव्यू देने की कोशिश मेरी रहेगी। 31 दिसंबर की शाम संगीत से लबरेज़ थी। यह एक खास तरह का संगीत था। इसमें दरअसल हिंदी के कई सारे हिंदी कवियों की उन कविताओं को गाया गया जिन्हें किसी न किसी नाटक में इस्तेमाल किया गया है। शब्द संगीत नाम से पेश की गई यह प्रस्तुति बहुत ही शानदार रही। अरण्य थियेटर ग्रुप के 14 युवा स्वरों ने जयशंकर प्रसाद, नागार्जुन, निराला के साथ-साथ गोरखपांडे, बल्ली सिंह चीमा जैसे समकालीन कवियों की रचनाएं गाईं। रंगमंचीय संगीत के पुरोधा ब.ब.कारंत की धुन में बंधी प्रसाद की रचना ‘बीती विभावरी’ से जब कार्यक्रम की शुरुआत हुई तो बस समां बंध गया। इसके बाद निराला की ‘बांधों न नाव इस ठांव बंधु’ और ‘बादल छाए, बादल छाए’ गाए गए। ‘बांधों न नाव’ को गोपाल तिवारी की प्यारी सी धुन में गाया गया। श्रोताओं में आठ-दस लोग विदेशी थे जो हिंदी नहीं जानते थे लेकिन गीतों की सुंदर धुनों ने उन्हें इस कदर बांधा कि उन्होंने लगभग तीन घंटे चले इस पूरे कार्यक्रम का पूरा आनंद उठाया। नागार्जुन की रचना ‘पांच पूत भारत माता के’ बच्चों के बीच खास तौर पर पसंद की गई। । गोपाल तिवारी ने अपना एक खूबसूरत गीत ‘रब्बा रोशनी कर तू' पेश किया जो बहुत पसंद किया गया।

नैनीताल वाले हमारे मंटूदा की धुन में बंधे कवि बल्ली सिंह चीमा जी के गीत ‘बर्फ से ढक गया है पहाङी नगर’ को जब गाया गया तो सोनापानी में हमारे साथ काम करने वाले लङके भी साथ-साथ गा रहे थे। दरअसल मुंबई में रहने वाला हमारा दोस्त गोपाल तिवारी सोनापानी की अपनी पिछली यात्राओं के दौरान उन्हें यह गीत याद करा चुका था। यह उन्हें इतना अच्छा लगता है कि अक्सर रसोई से समवेत स्वर में इस गाने की आवाज आती रहती है। अब तक संगीत के नाम पर फिल्मी गीतों को ही जानने वाले इन लङकों को बेहतर संगीत को जानते और उसका आनंद लेते देखना अच्छा लगता है। युवा जोशीली आवाजों पर तैरते गोरखपांडे के गीत ‘समय का पहिया चले रे साथी’ ने माहौल में गर्माहट भर दी। गोरखपांडे का यह गीत समय के बारे में कहता है…।
रात और दिल, पल-पल छिन-छिन आगे बढता जाए
तोङ पुराना नए सिरे से सब कुछ गढता जाए

इस उम्मीद के साथ कि पुराना जो सङ चुका है, अप्रासंगिक हो चुका है टूटेगा उसकी जगह कुछ नया रचा जाएगा जो अच्छा होगा, सच्चा होगा, आप सभी को नया साल मुबारक हो।

गुरुवार, १४ अगस्त २००८

रिमझिम बारिश के बीच पहाङी खाना

इन दिनों पहाङ झमाझम बारिश में भीग रहे हैं। हर तरह के पेङ-पौधे अपने सबसे सुंदर हरे रंग को ओढे हुए हैं। बादल आसमान से उतर कर खिङकियों के रास्ते घर में घुसे आ रहे हैं। आप छोटे-छोटे खिङकी-दरवाजों वाले एक पुराने लेकिन आरामदायक घर के अंदर बैठे छत की पटाल (स्लेट) पर लगातार पङ रही बूंदों की टापुर-टुपुर का आनंद ले रहे हों तो इस भीगे-भीगे से मौसम में खाने का ख्याल आना स्वाभाविक ही है। खाने की शौकीन होने के कारण मेरे लिए अच्छा मौसम भी एक बढिया बहाना है कुछ खाने का या कम से कम खाने को याद करने का :)। कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है की पहाङी खाना इतना विविधतापूर्ण, स्वादिष्ट और पौष्टिक होने के बावजूद पहाङ से बाहर लोकप्रिय होने में कामयाब क्यों नहीं रहा ? शायद रंगरूप और नामों का खांटी भदेस होना इसकी एक वजह रही हो।

बहरहाल, आजकल खेतों में अरबी, सेम (beans), शिमला मिर्च, मूली, हरी मिर्च, बैंगन, करेला, तोरी, लौकी, कद्दू, खीरे, टमाटर, राजमा लगा हुआ है। अरबी मेरी पसंदीदा सब्ज़ी है। अरबी को स्थानीय भाषा में पीनालू कहा जाता है और मुझे नहीं लगता कि पहाङ के अलावा कहीं और इसका इतना विविधतापूर्ण इस्तेमाल होता होगा। इसका मुख्य हिस्सा जङ यानि अरबी तो खाई ही जाती है, , इसकी बिल्कुल कमसिन नन्हीं रोल में मुङी पत्तियों को तोङ कर, काट कर सुखा लिया जाता है, जिन्हें गाब या गाबा कहा जाता है। अरबी के के तनों को काट कर सुखा लिया जाता है, जिन्हें नौल कहते हैं। नौल और गाबे की सब्ज़ियों का लुत्फ सर्दियों में उठाया जाता है जब ठंड की वजह से खेतों में सब्ज़ियां बहुत कम होती हैं। इनकी तरी वाली सब्ज़ी चावल के साथ खाई जाती है।

मूली को आमतौर पर सलाद के रूप में खाया जाता है लेकिन कुमाऊंनी खाने में (मोटी जङ वाली मटियाले रंग की पहाङी मूली) यह इतनी गहरी रची-बसी है कि बरसात और जाङों में खाई जाने वाली लगभग सारी सब्ज़ियों चाहे वह राई या लाई की पत्तियां हों या आजकल खेत में हो रही ऊपर लिखी हुई कोई भी सब्ज़ी के साथ मिला कर पकाई जाती है। मूली के साथ इन सब्ज़ियों का मेल बहुत अजीब सा सुनाई देता है न? लेकिन यकींन मानिए खाने में ये लाजवाब होती है। दरअसल पहाङी मूली मैदानी इलाकों में उगने वाली सफेद, सुतवां, नाजुक सी दिखने वाली रसीली मूलियों से न केवल रंगरूप में बल्कि स्वाद में भी बिल्कुल अलग होती हैं। सिर्फ मूली को सिलबट्टे में हल्का सा कुटकुटा कर मेथीदाने से छौंक कर बना कर देखिए, इसे थचुआ मूली कहते है, न कायल हो जाएं स्वाद के तो कहिएगा। मूली को दही के साथ भी बनाया जाता है।


पहाङी जीवन-शैली की तरह ही यहां का खाना भी सादा और आडंबररहित होता है। यही इसकी खासियत भी है। किसी भी सब्ज़ी को किसी के साथ भी मिला कर बनाया जा सकता है, पिछले हफ्ते मैं नैनीताल गई थी, रात को उमा चाची ने मुंगोङी आलू की रसेदार सब्ज़ी के साथ बींस, शिमला मिर्च और मूली की मिली-जुली सब्ज़ी खिलाई, आनंद आ गया। सब्ज़ियों का यह तालमेल केवल एक पहाङी घर में ही बनाया जा सकता है। कुछ सब्ज़ियां मेरे ख्याल से केवल पहाङ में ही होती हैं जैसे गीठी और तीमूल। बेल में लगने वाले गीठी भूरे रंग की आलूनुमा सब्ज़ी होती है जिसे एक खास तरीके से पकाया जाता है। तीमूल को पहले राख के पानी के साथ उबाल लेते हैं और उसके बाद उसे किसी भी अन्य सब्ज़ी की तरह छौंक कर सूखी या तरीवाली सब्ज़ी बना लेते हैं, बहुत ही स्वादिष्ट बनती है। एक और सब्ज़ी होती है पहाङ में जो खूब बनाई-खाई जाती है वो है गडेरी, मैदानी इलाकों के लोग उसे शायद कचालू के नाम से पहचानेंगे। भांग के बीजों को पीस कर उसके पानी को गडेरी के साथ पकाया जाए तो इसका स्वाद कुछ खास ही होता है।

लोकप्रिय पहाङी खानों में भट्ट (काला सोयाबीन) की चुङकानी, जंबू और धुंगार जैसे मसालों से छौंके आलू के गुटके, कापा (बेसन भून कर बनाया गया पालक का साग), दालें पीस कर बनाई गई बेङुआ रोटी इत्यादि शामिल हैं। पहाङी व्यंजनों में डुबकों का अपना खास मुकाम है। यह भट्ट, चना और गहद की दाल से बनते है, डुबके बनाने के लिए दाल को रात भर भिगा कर सुबह पीस लेना होता है और फिर इसे खास तरह का तङका लगा कर हल्की आंच में काफी देर तक पकाया जाता है। इसके अलावा उङद की दाल को पीस कर चैंस बनाई जाती है।

पहाङी खाने में चटनी की खास जगह है, चाहे वह शादी ब्याह में बनने वाली मीठी चटनी सौंठ हो या भांग के बीजों (इनमें नशा नहीं होता, गांजा भांग की पत्तियों से बनाया जाता है) को भून कर पीस कर बनाई गई चटपटी चटनी। इन दिनों पेङों पर दाङिम (छोटा, खट्टा अनार) लगा हुआ है, धनिया और पुदीना के पत्तों के साथ इसकी बहुत स्वादिष्ट चटनी बनती है। पहाङों में बङा नींबू जिसे मैदानी इलाकों में गलगल भी कहा जाता है बहुतायत से होता है। सर्दियों की कुनकुनी धूप में नींबू सान कर खाना एक अद्भभुत अनुभव होता है। इसके लिए नींबू को छील कर इसकी फांकों के छोटे-छोटे टुकङे कर लेते हैं, साथ में मूली को धो-छील कर लंबे पतले टुकङों में काट कर नींबू के साथ ही मिला लेते हैं। भांग के बीजों को तवे पर भून कर सिलबट्टे पर हरी मिर्च और हरी धनिया पत्ती, नमक के साथ पीस लेते हैं। अब इस पीसे हुए भांग के नमक को नींबू और मूली में मिला लेते हैं। अब एक कटोरा दही को इसमें मिला लेते हैं। स्वाद के मुताबिक थोङी सी चीनी अब इसमें मिला लीजिए और सब चीजों को अच्छी तरह से मिला लीजिए। इसके लाजवाब स्वाद के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं खुद जायका ले कर देखें।

इन दिनों यहां खीरे हो रहे हैं, पहाङ में खीरे को ककङी कहा जाता है और यह आमतौर पर मिलने वाले खीरे से आकार में दो-तीन गुना बङा होता है। जब खीरे नरम होते है तो उन्हें हरे नमक यानी धनिया, हरी मिर्च और नमक के पीसे मिश्रण के साथ खाया जाता है। खीरे जब पक जाते हैं तो उनका स्वाद हल्का सा खट्टा हो जाता है अब यह बङियां बनाने के लिए बिल्कुल तैयार है। इसे कद्दूकस करके रात भर भिगाई गई उङद की दाल की पीठी में हल्की सी हल्दी, हींग इत्यादि मिला कर छोटी-छोटी पकौङियों की शक्ल में सुखा लिया जाता है। बाद में आप इसे मनचाहे तरीके से बना सकते हैं।

मुझे खाने का शौक है और खास तौर पर पहाङी खाना बहुत ही ज्यादा पसंद है उसमें भी सबसे ज्यादा पसंद है रस-भात। रस दरअसल बहुत सारी खङी दालों से बनता है। इसके लिए पहाङी राजमा, सूंठ (पहाङ में होने वाली सोयाबीन की एक किस्म), काला और सफेद भट्ट, उङद, छोटा काला चना, गहत इत्यादि दालों को अच्छी तरह से धो कर रात में ही भिगा दिया जाता है। सुबह उसी पानी में मसाले डाल कर चूल्हे की हल्की आंच में काफी देर तक उसे पकाया जाता है जब सारी दालें पक जाती हैं तो पानी को निथार कर अलग कर लिया जाता है। दालों का यही पानी रस कहलाता है जिसे शुद्ध घी में हल्की सी हींग, जम्बू और धूंगार के पहाङी मसालों का तङका लगा कर गरमा-गरम चावलों के साथ खाया जाता है।

फिलहाल इतना ही, फिर किसी और दिन करेंगे चर्चा कुछ और पहाङी व्यंजनों की। बाहर बारिश तेज़ हो गई है।

शनिवार, १० मई २००८

समय-दो

(...... और यह रहा दूसरा हिस्सा)
समय चुपचाप चहलकदमी करता रहता है
पल-छिन का हिसाब-किताब करते हुए
कभी न रुक सकने की नियति ढोता, बेबस
समय करता है कल्पना घङियों की कैद से मुक्ति की
बाबरा है समय, जाने क्या-क्या सोचता है

लेकिन सोचो तो अगर समय निकल ही जाए
घङियों की कैद से, तो क्या होगा
तब उन बेचारों पर तो बङी बुरी बीतेगी
जो बेहतर कल के सपनों के साथ
जैसे-तैसे काट रहे हैं आज का कठिन दिन
लेकिन उनकी बन आएगी
जिनके पापों का फल मिलना है कल

ऐसे तो उलट-पुलट जाएगा सब कुछ
सोचता है समय
समय महसूस करता है जिम्मेदारी
इसलिए बना रहता है कैद में
मुस्तैदी से करता है पल-छिन का हिसाब

वो शायद कभी जान भी नहीं पाता होगा
कितना डर जाता है कोई
किसी पुराने महल के उजङे, वीरान खंडहर में
चहलकदमी करते हुए
घङियों में कैद समय की ताकत को जान कर

रविवार, ४ मई २००८

समय 1

(समय पर लिखने की मेरी कोशिश का पहला हिस्सा)
मां शायद कभी न देती
आर्शीवाद खूब बड़े हो जाने का
अगर जान पाती कि
कितनी अकेली हो जाएगी वो तब।

लङकियों की शादी का सपना
संजोते पिता भी अगर जानते होते
उनके विदाई के बाद के
खून तक में चुभने वाले एकाकीपन को
तो शायद सपनों को किसी दूसरे रंग में रंगते।

बेटे की ऊंची नौकरी भी शायद
उनकी प्रार्थनाओं में नहीं होती
अगर पहले से महसूस कर पाते
घर में उनके न होने का दर्द।

कितना कुछ छूट जाता है, कट जाता है
एक परिवार में,
सिर्फ समय के आगे बढ़ जाने से।

कभी शौक से बनवाया चमचमाता नया घर
बीतते वर्षों के साथ पुराना बूढ़ा दिखाई देने लगता है
निर्वासित छूटे घर के दर्द को पीते हैं
अपने बालों की सफेदी और चेहरे की झुर्रियों के साथ
बूढ़े होते मां-बाप धूप में अकेले बैठ कर
अचानक खूब बड़े हो गए घर में
बच्चों की पुरानी छूटी आवाजों को सुनते हुए।